Video - वामपंथी आंदोलन और कांग्रेस सरकार की नीतियां आदिवासियों को डराने-दबाने वाली रहीं : शाह
नई दिल्ली। लोकसभा में नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने वामपंथी आंदोलन की भूमिका और कांग्रेस पार्टी की सरकार की नीतियों को लेकर जमकर हमला बोला। केंद्रीय गृह मंत्री सोमवार को इस मुद्दे पर अपनी बात रख रहे थे। उन्होंने तथ्यों और तर्कों के साथ माओवादी उग्रवादियों और वामपंथी नीतियों को आदिवासियों को डराने और दबाने वाला करार दिया। इसमें कांग्रेस सरकार के रवैये की भी उन्होंने आलोचना की।
वामपंथी उग्रवाद ने विकास को रोका
केंद्रीय गृहमंत्री ने कहा कि इन्होंने भोले-भाले आदिवासियों को बरगला कर अपनी विचारधारा का अनुयायी बनाया। उन्हें डर था कि यदि ये पढ़-लिख गए, तो हमारे साथ नहीं रहेंगे, इसलिए इन्होंने स्कूल जला दिए। इनके बैंक अकाउंट खुल गए, तो ये हमारे साथ नहीं रहेंगे, इसलिए बैंक भी जला दिए। दवाखाने भी जला दिए और फिर कहा कि विकास वहां पहुंचा ही नहीं। वास्तव में, वामपंथी उग्रवाद ने इन क्षेत्रों में विकास को पहुंचने ही नहीं दिया, जबकि आज मोदी जी के नेतृत्व में विकास वहां पहुंच रहा है।
उन्होंने कहा कि नक्सलवाद की जड़ें गरीबी और विकास से जुड़ी नहीं हैं। मैं 60 के दशक के कुछ क्षेत्रों का उदाहरण देना चाहता हूं। बक्सर में साक्षरता दर 35%, सहरसा में 33% और बलिया में 31% थी। इन सभी स्थानों पर साक्षरता दर और प्रति व्यक्ति आय लगभग समान थी, फिर भी नक्सलवाद बस्तर में पनपा, जबकि बक्सर और सहरसा में नहीं पनपा। यदि विकास ही इसका पैमाना होता, तो यह वहां भी पनपता लेकिन इन क्षेत्रों का भूगोल ऐसा नहीं था, जहां वे छिप सकते थे।
कांग्रेस के शासन में हुआ इनका विकास
अमित शाह ने कहा कि भारत में नक्सल हिंसा 1970 के दशक में नक्सलबाड़ी से शुरू हुई। 1980 के दशक में पीपल्स वॉर ग्रुप के जरिये यह महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और ओडिशा तक फैली। 1990 के दशक में वामपंथी गुटों का आपस में विलय शुरू हुआ। 2004 में सीपीआई (माओवादी) का गठन हुआ और इसके बाद नक्सल हिंसा ने गंभीर रूप ले लिया। इस पूरे कालखंड में अधिकांश समय कांग्रेस पार्टी का शासन रहा।
कांग्रेस के समर्थन से बना रेड कॉरिडोर
शाह ने कहा कि 1970 में इंदिरा जी ने संजीव रेड्डी के ख़िलाफ़ अपना प्रत्याशी उतारा और उस समय आधार तलाश रही माओवादी पार्टी ने इंदिरा गांधी को समर्थन दिया। इंदिरा गांधी ने उस समर्थन को स्वीकार कर लिया। इसके बाद वे माओवादी विचारधारा के प्रभाव में रहीं और माओवाद धीरे-धीरे देश में फैल गया। विशेषज्ञों का कहना है कि सत्ता के समर्थन के बिना रेड कॉरिडोर बन ही नहीं सकता।
न्याय केवल अदालत में ही हो सकता है
केंद्रीय गृहमंत्री ने कहा कि माओवादी उग्रवादियों को अन्याय के खिलाफ हथियार उठाने वाला समझने की गलती नहीं करनी चाहिए थी। इन्होंने अपना वैचारिक आधार खो दिया, इसलिए ये किसी भी तरह अपने अस्तित्व को बचाने में लगे रहे। देश के स्वाभाविक असंतोष को हथियारों के माध्यम से दिशा देकर एक वैक्यूम बनाना इनका उद्देश्य था। कई भोले-भाले ग्रामीणों को ‘एनिमी इन्फॉर्मेट’ बताकर इन्होंने फांसी पर लटका दिया। इन्होंने ‘जनता अदालत’ के नाम से एक व्यवस्था खड़ी की, जहां वे स्वयं ही फैसले लेते थे और सजा भी देते थे। उन्होंने कहा कि इस देश में संविधान का राज है, 'न्याय केवल देश की अदालतों में ही हो सकता है।'
बस्तर में चलाते थे समानांतर सरकार
अमित शाह ने कहा कि इन्होंने बस्तर में एक समानांतर सरकार बनाई। इनका अपना ‘होम मिनिस्टर’ होता था। लूटे हुए अनाज को बांटने के लिए अलग ‘खाद्य आपूर्ति मंत्री’ होता था। ‘जनता सरकार’ के नाम से एक भ्रांति खड़ी की गई थी।
कांग्रेस ने वंचित रखा, मोदी ने किया विकास
उन्होंने कहा, आजादी के बाद के 75 सालों में से 60 साल तक सत्ता आपके (कांग्रेस के) हाथों में रही। तो फिर, आज तक आदिवासी समुदाय विकास से वंचित क्यों रहे? असली विकास तो पीएम नरेंद्र मोदी के आने के बाद ही हो रहा है। 60 सालों तक आप उन्हें घर या साफ पानी उपलब्ध कराने में नाकाम रहे, आपने उनके लिए कोई स्कूल नहीं बनाया। आपने उनके इलाकों तक मोबाइल टावर और बैंकिंग सुविधाएं पहुंचने से रोकीं। और फिर भी, अब आप ही लोग जवाबदेही की मांग कर रहे हैं?
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