नेपाल संसदीय चुनाव 2026: क्या गठबंधन सरकार के बन रहे आसार
दरअसल, इन संसदीय चुनाव की नौबत नेपाल में इसलिए आई है कि सितंबर 2025 में Gen Z ने राजनीतिक दलों खासकर सत्ताधारी गठबंधन सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के आरोपों को लेकर जबरदस्त प्रदर्शन करके नाराजगी जताई थी। इन विरोध प्रदर्शनों से वहां की सरकार हिल गई थी। नतीजतन, इन विरोध प्रदर्शनों ने तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की सरकार को गिरा दिया था। तब सुशीला कार्की के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी, जिसने संसद भंग कर नए चुनावों को मार्च 2026 तक कराने की घोषणा थी।
भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद से भड़का था गुस्सा
ओली सरकार को लेकर भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और राजनीतिक भाई-भतीजावाद जैसे मुद्दों पर फूटे युवाओं के गुस्से की वजह से असामयिक चुनाव की स्थितियां बनी थीं। Gen Z के प्रदर्शनों के दौरान करीब 77 लोगों की मौत हुई और 2,000 से अधिक घायल हुए थे। ऐसी स्थितियों के 6 महीने बाद होने जा रहे नेपाल के इन संसदीय चुनावों को वहां की राजनीति में महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है। अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि वहां युवा सुधारों की मांग और पुरानी पार्टियों पर लगाए गए विभिन्न आरोपों के बाद नेपाल का मतदाता किस सोच और उम्मीद के साथ मतदान कर किसके हाथ में सत्ता की बागडोर सौंपता है।
नेपाल चुनावी माहौल
नेपाल का वर्तमान चुनावी माहौल तनावपूर्ण और परिवर्तन की उम्मीदों से भरा हुआ है। सितंबर 2025 के Gen Z विरोध प्रदर्शनों के बाद देश में युवा असंतोष प्रमुख मुद्दा बना हुआ है, जो भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और आर्थिक असमानता पर केंद्रित है। आंकड़े बताते हैं कि नेपाल की लगभग 20% आबादी गरीबी रेखा से नीचे जी रही है। चुनाव प्रचार में मेगा इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स जैसे बड़े जलविद्युत संयंत्र, सड़कें और ट्रांसमिशन लाइनें प्रमुख वादे हैं, लेकिन पर्यावरणीय जोखिमों के मामले में भी नेपाल दुनिया का छठा सबसे जलवायु-संवेदनशील देश है।
आंदोलन से उपजी स्थितियां क्या नई राह दिखाएंगी?
जानकारी के अनुसार, चुनावी उत्साह के बीच ध्रुवीकरण बढ़ रहा है, जहां 'पॉपुलिस्ट-एक्स्ट्रीमिज्म' का उदय हो रहा है, जो संस्थागत विश्वास को कमजोर कर रहा है और भावनात्मक, व्यक्तित्व-केंद्रित राजनीति को बढ़ावा दे रहा है। युवा मतदाता पुरानी पार्टियों से निराश हैं और नई दिशा की उम्मीद कर रहे हैं। साइलेंट पीरियड से पहले मतदाताओं को गहन चिंतन का समय मिल रहा है। कई लोगों का मानना है कि यह चुनाव कम्युनिस्ट पार्टियों के असफल नेतृत्व का फैसला करेगा। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर, भारत और चीन जैसे पड़ोसी देशों की नजरें भी नेपाल के इन संसदीय चुनाव के नतीजों पर टिकी हैं।
ये पार्टियां कर रहीं जोर आजमाईश?
नेपाल के चुनाव आयोग के अनुसार, कुल 68 राजनीतिक पार्टियां चुनाव में हिस्सा ले रही हैं। हालांकि, मुख्य मुकाबला 4-5 प्रमुख पार्टियों के बीच ही माना जा रहा है। बाकी छोटी या क्षेत्रीय पार्टियां हैं। नेपाल के राजनीति पर नजर रखने वालों से मिली जानकारी के अनुसार, मुख्य पार्टियों के प्रमुख नेता और उनका मुख्य मुद्दा निम्नवत है:-
नेपाली कांग्रेस (NC)
नेता
गगन थापा (49 वर्ष)
मुद्दे
आर्थिक सुधार, युवा नवीनीकरण, 'कांग्रेस 2.0' ब्रांडिंग के साथ सेवा वितरण और विकास। अगले पांच वर्षों को 'आर्थिक पुनरुत्थान का आधा दशक' घोषित किया।
सीपीएन-यूएमएल (CPN-UML)
नेता
केपी शर्मा ओली (74 वर्ष)
मुद्दे
पारंपरिक आधार, स्थिरता और राष्ट्रीय विकास। ओली तीन बार प्रधानमंत्री रह चुके हैं।
कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (माओइस्ट सेंटर) या एनसीपी
नेता
पुष्प कमल दहाल 'प्रचंड' (पूर्व प्रधानमंत्री)
परिदृश्य
पारंपरिक कम्युनिस्ट वोटर बेस, लेकिन युवा सुधारों में पिछड़ रही।
राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP)
नेता
रवि लामिछाने, लेकिन बालेंद्र शाह बालेन (35 वर्ष) प्रमुख चेहरा
मुद्दे
युवा-केंद्रित राजनीति, भ्रष्टाचार विरोधी। बालेन ओली के खिलाफ झापा-05 से लड़ रहे हैं।
राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी (RPP)
मुद्दे
राष्ट्रीयता और सुधार पर फोकस, लेकिन छोटा आधार।
इनके अलावा, श्रम संस्कृति पार्टी, उज्ज्वल नेपाल पार्टी जैसी नई पार्टियां भी पारंपरिक गढ़ों में प्रतिस्पर्धा बढ़ाये हुए हैं।

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