Video - 'भुतहा गांवों' में घरों को रहने वालों का इंतजार
नई दिल्ली। रोजी-रोटी की तलाश में वर्षों पहले अपने गांव से शहरों और महानगरों में जाकर बस गई आबादी अपने पुरखों की जगह-जमीन को भूल चुकी है। गांव में ऐसे घरों पर ताले लटक रहे हैं या फिर वे खंडहर होते जा रहे हैं। उत्तराखंड में भी ऐसी ही स्थिति है। यहां यह स्थिति और जगहों के मुकाबले ज्यादा दिखती है, क्योंकि ऊंची-ऊंची पहाड़ियों और जंगल के बीच बसे इन गांवों में वर्षों से लोग अपने घरों में लौट कर नहीं आए हैं। ऐसे गांव में कुछ ही परिवार रहते मिलते हैं। बाकी घरों में ताला लटक रहा है।
यह तब है, जब ऐसे गांव तक आने-जाने के लिए पिछले वर्षों के मुकाबले सुविधा बहुत बढ़ गई हैं। आने-जाने के मार्ग बन गए हैं। कुछ जगहों पर आसपास तक वाहनों का आवागमन भी होता है। उत्तराखंड में वीरान पड़े ऐसे गांव को 'घोस्ट विलेज' यानी भुतहा गांव कहा जाता है। ऐसे गांव के मूल निवासियों को उनके घरों तक लाने के लिए भारतीय जनता पार्टी के सांसद अनिल बलूनी ने अनोखी पहल की है। सांसद बलूनी शुक्रवार को ऐसे ही कुछ गांव में पहुंचे। उनके साथ कभी इन गांव में रहने वाले परिवारों के कुछेक सदस्य भी थे। यहां के गांवों के बंद पड़े घरों के बीच कुछ जगहों पर खंडहर हो चुके घर भी दिखे। सांसद बलूनी ने लोगों को वहां साल में अपने परिवार का कोई एक कार्यक्रम करके इन्हें आबाद रखने की अपील की।
घोस्ट विलेज पातली गांव पहुंचे
अपने एक अकाउंट पर संसद बलूनी ने लिखा, 'आज पौड़ी जिले के कोट ब्लॉक स्थित निर्जन (घोस्ट विलेज) पातली गाँव पहुँच कर प्रवासी एवं स्थानीय ग्रामीणों के साथ आत्मीय संवाद का अवसर मिला। पलायन के कारण खाली होते गाँवों की पीड़ा सभी की आँखों में साफ झलक रही थी, लेकिन अपने गाँव को फिर से बसाने का संकल्प भी उतना ही मजबूत दिखाई दिया।
मैंने सभी से आग्रह किया कि अपने गाँवों को आबाद करने के लिए हम नए-नए तरीके अपनाएं, कम से कम एक लोकपर्व, परिवार के किसी सदस्य का जन्मदिन और एक विवाह समारोह अपने गाँव में अवश्य आयोजित करें, ताकि हमारी नई पीढ़ी अपनी जड़ों, संस्कृति और परंपराओं से जुड़ी रहे और हमारे गाँव फिर से गुलज़ार हों।
पलायन रोकना और गाँवों का विकास हमारी पहली प्राथमिकता है। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी द्वारा सीमांत और पर्वतीय क्षेत्रों को सशक्त बनाने के लिए चलाए जा रहे प्रयासों को भी जनभागीदारी से और मजबूत करना हम सबकी जिम्मेदारी है। आइए, हम सब मिलकर अपने गाँव, अपनी विरासत और पहाड़ के भविष्य को सुरक्षित रखने का संकल्प लें।'
उत्तराखंड के करीब 1800 गांवों को घोस्ट विलेज घोषित किया जा चुका है। इन गांव में तीन लाख के करीब घरों पर ताले लटक रहे हैं।

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